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तीन तलाक पर विधि आयोग नहीं देगा राय | TTI

तीन तलाक पर विधि आयोग नहीं देगा रायतीन तलाक पर विधि आयोग नहीं देगा राय
जस्टिस चौहान ने बताया कि समान नागरिक संहिता संवैधानिक व्यवस्था है।

माला दीक्षित, नई दिल्ली। एक देश एक कानून यानी समान नागरिक संहिता में सबसे ज्यादा चर्चित रहा तीन तलाक का मुद्दा अब विधि आयोग की राय का हिस्सा नहीं होगा, क्योंकि उस पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ चुका है। लेकिन, अगर समान नागरिक संहिता पर समग्र कानून की सिफारिश संभव नहीं हुई, तो विधि आयोग पर्सनल लॉ में संशोधन के सुझाव दे सकता है, ताकि लिंग आधारित न्याय सुनिश्चित हो और समानता के अधिकार का उल्लंघन न हो।

ये बात विधि आयोग के अध्यक्ष जस्टिस बीएस चौहान ने दैनिक जागरण को विशेष बातचीत में बताई। उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार ने समान नागरिक संहिता पर विधि आयोग को रिपोर्ट देने को कहा है। जस्टिस चौहान ने बताया कि समान नागरिक संहिता संवैधानिक व्यवस्था है। संविधान के दायरे में विचार कर आयोग इस पर रिपोर्ट देगा। लेकिन, अगर समान नागरिक संहिता पर समग्र कानून संभव नहीं हुआ तो आयोग विभिन्न समुदायों के पर्सनल लॉ जैसे शादी, विवाह विच्छेद, उत्तराधिकार आदि से संबंधित कानूनों में संशोधनों का सुझाव दे सकता है। वैसे बहुविवाह सिर्फ मुसलमानों में ही नहीं है। हिंदुओं में भी कई जनजातियों में यह प्रचलित है।

पारसी कानून में तलाक का मुद्दा भी शायद आयोग की सिफारिश का हिस्सा न बने, क्योंकि यह मुद्दा भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। पारसी कानून में तलाक की प्रक्रिया जटिल है। सिर्फ हाई कोर्ट ही तलाक दे सकता है। विचार करते समय विभिन्न वर्गो को संविधान के शिड्यूल 6 और अनुच्छेद 371ए व (2) और 371 (आइ) में मिली छूट का ध्यान रखा जाएगा। ये प्रावधान उत्तर-पूर्वी राज्यों के बारे में हैं। समान नागरिक संहिता पर जारी 16 सवालों की प्रश्नावली पर आयोग को करीब 50 हजार सुझाव मिले हैं। उनमें से करीब 40 हजार सुझाव सिर्फ तीन तलाक पर हैं। हालांकि, आयोग अब इस पर विचार नहीं करेगा।

बताते चलें कि सुप्रीम कोर्ट ने निकाह हलाला और बहु विवाह पर विचार करने से इन्कार कर दिया था। हालांकि, समान नागरिक संहिता पर आयोग की ओर से जारी प्रश्नावली में ये दोनों मुद्दे शामिल हैं। इसलिए आयोग इन पर विचार कर सकता है। लेकिन, जस्टिस चौहान कहते हैं कि निकाह हलाला कोई इतना बड़ा मुद्दा नहीं है और बहु विवाह हिंदुओं में भी प्रचलित है।

जस्टिस चौहान ने कहा कि सुझावों का अभी बारीकी से अध्ययन नहीं हुआ है। जनवरी से अध्ययन शुरू होगा। जस्टिस चौहान कहते हैं कि यह एक गंभीर और विस्तृत विषय है। इस पर विचार कर रिपोर्ट देने में वक्त लगेगा। रिपोर्ट की कोई समयसीमा अभी तय नहीं है। लेकिन जस्टिस चौहान का कार्यकाल अगस्त तक है। ऐसे में माना जा सकता है कि रिपोर्ट अगस्त तक आ जाएगी।

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